ज्ञान गिरी संत:- जब मन रमा तो हो गए बैरागी।
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Published - 03 May 2026 11 views
भगवन्त यादव ✍️
कुशीनगर।इंसान का जीवन संघर्षों से गुजरना तो आम बात है, लेकिन जब कोई भरा-पूरा परिवार — माता-पिता, पत्नी, बेटा-बहू, पौत्र-पौत्री — के मोह-माया का त्याग कर संत-संन्यासी जीवन अपना ले, तो वह साधारण बात नहीं।

ऐसे ही हैं *ज्ञान गिरी संत*, जो कुशीनगर के कसया तहसील के गांव टेकुआटार में स्थित भगवान शिव और हनुमान जी के प्राचीन मंदिर के पुजारी हैं।
पहलवानी-किसानी से बैराग्य तक का सफर।
संवाददाता से बातचीत में उन्होंने बताया, "35 साल से मैं बैरागी संत-संन्यासी जीवन जी रहा हूँ। यह मेरे गुरु विभूति गिरी जी का आशीर्वाद है। उनके मार्गदर्शन और प्रेरणा से मेरे जीवन में परिवर्तन आ गया।"
पहले इनका नाम रामजीत था। गुरु जी ने ही नामकरण कर 'ज्ञान गिरी' रखा। संत बताते हैं, "पहले मैं पहलवानी और किसानी करता था। माता-पिता की असीम कृपा रही। फिर अध्यात्म की ओर झुकाव हुआ और भगवान शिव की कृपा से इस मंदिर में पूजारी बन गया।"
मोह-माया का त्याग :-काम, क्रोध, मद, लोभ को छोड़कर उन्होंने परिवार का मोह त्याग दिया। कहते हैं, "जब मन रमा तो हो गए ज्ञान गिरी संत।"

आज टेकुआटार के इस प्राचीन मंदिर में दर्शन करने आने वाले श्रद्धालुओं को वे सेवा और अध्यात्म का मार्ग दिखाते हैं। जो भी श्रद्धालु यहाँ आता है, संत ज्ञान गिरी उसे सरलता और वैराग्य का संदेश देते हैं।
यह कहानी बताती है कि सच्चा वैराग्य उम्र या परिस्थिति का मोहताज नहीं — जब मन प्रभु में रम जाए, तो दुनिया की सारी माया पीछे छूट जाती है।
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