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भारतीय संस्कृति के आधार: ऋषि परम्परा का चतुर्विध अवदान:- आचार्य धीरज द्विवेदी याज्ञिक।

प्रयागराज।भारत की आत्मा ऋषियों में बसती है। 'ऋषि' अर्थात् दृष्टा - "ऋषति पश्यति इति ऋषिः"। हमारी संस्कृति नगर नहीं, वन और ऋषि-कुटीर से निकली है। ऋषियों का अवदान चार क्षेत्रों में युग-प्रवर्तक रहा है।
1. ब्रह्माण्ड-बोध: ऋषियों ने ब्रह्माण्ड को जड़ नहीं, चेतन माना - "यत् पिण्डे तत् ब्रह्माण्डे"। नासदीय सूक्त का-"नासदासीन्नो सदासीत्" आज के Big Bang से भी गहरा है...
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