गुरुकुलों का महत्व ब्रह्माण्ड से साहित्य तक:- आचार्य धीरज द्विवेदी याज्ञिक ✍️।
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Published - 11 September 2026 50 views

प्रयागराज। भारतीय चिंतन में शिक्षा कभी भी केवल रोजगार का साधन नहीं रही। वह सृष्टि के ऋत को धारण करने की प्रक्रिया रही है। इसी प्रक्रिया का नाम है गुरुकुल। गुरुकुल एक भवन नहीं, एक ब्रह्माण्डीय व्यवस्था है। उसके महत्व को समझने के लिए हमें ऊपर से नीचे की ओर, ब्रह्माण्ड से प्रारंभ करके साहित्य तक आना होगा, क्योंकि गुरुकुल का अवतरण भी वहीं से हुआ है।
1. ब्रह्माण्ड में गुरुकुल - ऋत का संरक्षक।
वेद कहता है- ऋतं च सत्यं चाभीद्धात् तपसोऽध्यजायत। सृष्टि ऋत अर्थात् Cosmic Order से चलती है। गुरुकुल इस ऋत का पहला पहरेदार है।
गुरुकुल में ब्रह्ममुहूर्त में होने वाला गायत्री जप, अग्निहोत्र और ॐ का उद्घोष केवल धार्मिक कृत्य नहीं हैं। ये वैज्ञानिक रूप से सिद्ध ध्वनि-चिकित्सा हैं। जब वटुक एक लय में मंत्रों का उच्चारण करते हैं, तो 432 Hz की वह वैदिक ध्वनि-तरंग पृथ्वी के वातावरण के विक्षोभ को शांत करती है। इसीलिए शास्त्र ने कहा- ब्राह्मणों के त्याग एवं तपस्या से ही पृथ्वी स्थिर है।
आज का विज्ञान जिसे Schumann Resonance कहता है, उसे हमारे ऋषियों ने गुरुकुल की संध्या के रूप में सहस्राब्दियों पूर्व ही साध लिया था। यदि गुरुकुल बंद होंगे, तो मनुष्य का ब्रह्माण्ड से संवाद बंद हो जाएगा। वह केवल पृथ्वी पर रहेगा, पृथ्वी के साथ नहीं।
2. विश्व और मानवता में गुरुकुल वसुधैव कुटुम्बकम् का विश्वविद्यालय*
आज संयुक्त राष्ट्र संघ विश्व शांति का प्रयास कर रहा है, पर शांति प्रस्तावों से नहीं, प्रार्थनाओं से आती है। गुरुकुल विश्व की एकमात्र ऐसी संस्था है जो प्रतिदिन प्रार्थना करती है-
धर्म की जय हो, अधर्म का नाश हो, प्राणियों में सद्भावना हो, विश्व का कल्याण हो।
यह प्रार्थना किसी सम्प्रदाय की नहीं है। इसमें कोई पराया नहीं है। गुरुकुल का बालक जब यह कहता है, तो वह ईसाई के लिए भी, मुसलमान के लिए भी, बुद्ध के लिए भी और नास्तिक के लिए भी कल्याण की कामना कर रहा होता है। यही *वसुधैव कुटुम्बकम्* का जीवंत रूप है।
विश्व को आज भोगवादी शिक्षा ने बाजार दिया है, गुरुकुल त्यागवादी शिक्षा से उसे परिवार बना सकता है। मानवता को यदि अहिंसा, करुणा और सह-अस्तित्व सीखना है, तो उसे गुरुकुल की चौखट पर आना ही होगा।
3. राष्ट्र में गुरुकुल राष्ट्र की आत्मा का सैनिक।
राष्ट्र केवल सीमा से नहीं बनता, संस्कार से बनता है। चाणक्य ने कहा था- राष्ट्र की सुरक्षा अस्त्र से नहीं, शास्त्र से होती है।
गुरु वशिष्ठ के गुरुकुल ने राम को मर्यादा पुरुषोत्तम बनाया, संदीपनि के गुरुकुल ने कृष्ण को योगेश्वर बनाया, और चाणक्य के गुरुकुल ने चंद्रगुप्त को अखंड भारत का निर्माता बनाया। गुरुकुल ने कभी भीड़ नहीं बनाई, नायक बनाए।
आज जब हम राष्ट्रवाद की बात करते हैं, तो गुरुकुल उस राष्ट्रवाद को रक्त से नहीं, ऋषि-रक्त अर्थात् संस्कार से सींचता है। एक वटुक जो प्रतिदिन- "माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः" कहता है, वह भूमि को जमीन का टुकड़ा नहीं, माँ समझता है। ऐसा नागरिक ही राष्ट्र की रक्षा कर सकता है। यह है गुरुकुल का राष्ट्र-विज्ञान।

4. धर्म में गुरुकुल- धर्म का प्रयोगशाला रूप।
धर्म शब्द "धृ धातु से बना है- जो धारण करे। धर्म भाषण से धारण नहीं होता, आचरण से होता है।
गुरुकुल धर्म का संग्रहालय नहीं, प्रयोगशाला है। वहाँ धर्म का निबंध नहीं पढ़ाया जाता, धर्म जिया जाता है। प्रातः सूर्योदय से पूर्व जागरण, शौच-स्नान, संध्या-वंदन, अग्निहोत्र, वेद-पाठ, गुरु-सेवा, भिक्षा-चर्या और अतिथि-सत्कार ये सब धर्म के प्रैक्टिकल हैं।
यदि मंदिर धर्म का शरीर है, तो गुरुकुल उसका प्राण है। मंदिर में आप घंटा बजते हुए सुनते हैं, गुरुकुल में आप सीखते हैं कि वह घंटा क्यों बजाना चाहिए। मंदिर में मूर्ति है, गुरुकुल में मूर्ति में प्राण प्रतिष्ठा करने वाला मंत्र है। गुरुकुल के बिना धर्म केवल रूढ़ि बन जाता है।
5. समाज में गुरुकुल- मानव निर्माण की भट्टी।
आधुनिक विद्यालय आपको डॉक्टर, इंजीनियर, वकील तो बना देगा, पर मनुष्य कौन बनाएगा? यह कार्य गुरुकुल करता है।
गुरुकुल में एक राजा का पुत्र और एक निर्धन का पुत्र एक ही पंक्ति में बैठकर, एक ही भोजन करते हैं, एक ही वस्त्र पहनते हैं। वहाँ न जाति का भेद है, न धन का अहंकार। वहाँ भिक्षा माँगना लाचारी नहीं, विनम्रता का अभ्यास है। गुरु के चरण दबाना दासता नहीं, अहंकार को गलाने की तपस्या हैऔर इस समाज के लिए सबसे बड़ा सूत्र गुरुकुल ही देता है- जब दुनियाँ सोती रहती है तब ब्राह्मण संसार के कल्याण की कामना करता है। जब सारा समाज अपने स्वार्थ में सोया होता है, तब गुरुकुल का ब्राह्मण ही है जो लोकमंगल के लिए जाग रहा होता है। यही समाज को समाज बनाता है, भीड़ नहीं।

6. साहित्य में गुरुकुल- साहित्य का अमरत्व।
अंत में हम आते हैं साहित्य पर, जो इस क्रम की अंतिम और सबसे मधुर कड़ी है।वेद, ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषद, रामायण, महाभारत, पुराण, काव्य, व्याकरण, ज्योतिष, आयुर्वेद- ये सब गुरुकुलों की ही वाणी हैं। ये ग्रंथ पुस्तकालयों में नहीं लिखे गए, गुरु-शिष्य की उस पवित्र परम्परा में गूँजे हैं जहाँ गुरु बोलता था और शिष्य सुनकर उसे कंठ में धारण करता था। इसीलिए वेद को "श्रुति" कहा गया।
यदि गुरुकुल न होते, तो संस्कृत- जो विश्व की सबसे परिष्कृत, वैज्ञानिक और कम्प्यूटर के लिए सर्वाधिक योग्य भाषा है वह केवल शिलालेखों में रह जाती। गुरुकुल ने उसे जिल्द नहीं दी, जीभ दी। कंठ दिया। स्वर दिया।
गुरुकुल ने साहित्य को केवल सुरक्षित नहीं रखा, उसे पवित्र रखा। आज साहित्य बाजार में बिकता है, गुरुकुल के साहित्य में आचमन किया जाता है।
इस प्रकार ब्रह्माण्ड से लेकर साहित्य तक, गुरुकुल एक ही सूत्र में सबको पिरोए हुए है। वह ब्रह्माण्ड को स्थिर रखता है, विश्व को परिवार बनाता है, राष्ट्र को चरित्र देता है, धर्म को आचरण देता है, समाज को संस्कार देता है और साहित्य को अमरत्व देता है।
गुरुकुल कोई अतीत की स्मृति नहीं है, वह भविष्य की अनिवार्यता है। जिस दिन गुरुकुल बंद हो जाएँगे, उस दिन मनुष्य के पास उपग्रह तो होंगे, पर मार्गदर्शन नहीं होगा।
गुरुकुल बचेगा, तभी भारत बचेगा। भारत बचेगा, तभी यह वसुधा और यह ब्रह्माण्ड बचेगा।

आचार्य धीरज द्विवेदी याज्ञिक✍️।
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