शिक्षक एमएलसी चुनाव:- कुशीनगर में सियासी ध्रुवीकरण की चर्चा, 27 अक्टूबर के परिणाम पर टिकी निगाहें।
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Published - 25 October 2026 13 views

भगवन्त यादव✍️।
कुशीनगर। गोरखपुर-फैजाबाद खंड शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र के लिए 23 अक्टूबर को मतदान संपन्न हो चुका है। मतदान प्रतिशत 85.14 रहा। अब सभी की निगाहें 27 अक्टूबर को होने वाली मतगणना पर टिकी हैं। इस चुनाव को लेकर पिछले कुछ महीनों में जनपद कुशीनगर के भीतर जो गतिविधियां देखने को मिलीं, वे केवल प्रत्याशियों के बीच मुकाबले तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि शिक्षकों की प्राथमिकताओं, राजनीतिक दलों की रणनीति और स्थानीय स्तर पर बने समीकरणों की भी कहानी कहती हैं। शिक्षक होने के साथ-साथ पत्रकार के रूप में इन गतिविधियों को करीब से देखने का अवसर मिला। विभिन्न सम्मेलनों, बैठकों और शिक्षकों के बीच हुई चर्चाओं से जो तस्वीर उभरकर सामने आई, वह इस चुनाव को दिलचस्प बनाती है।

चुनाव के शुरुआती दौर में जनपद के अलग-अलग स्थानों पर शिक्षकों के सम्मेलन और अन्य कार्यक्रम आयोजित हुए। इन आयोजनों में उदित नारायण इंटरमीडिएट कॉलेज, पडरौना के शिक्षक और स्थानीय प्रत्याशी राजीव यादव के पक्ष में समर्थन की आवाज सुनाई दी। शिक्षकों के बीच उनकी सक्रियता और स्थानीय स्तर पर किए गए प्रयासों की चर्चा होती रही। खासकर मतदाता सूची में नए शिक्षकों के नाम जुड़वाने के लिए उनकी मेहनत को लेकर कई तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आईं। कुछ शिक्षकों का कहना था कि वे राजीव यादव के प्रयासों से ही इस निर्वाचन में मतदाता बन सके। ऐसे में उनके पक्ष में समर्थन की चर्चा को केवल चुनावी प्रचार के रूप में देखना शायद पूरी तस्वीर को समझना नहीं होगा।

इसके बाद जिला मुख्यालय रविंद्रनगर में आयोजित एक शिक्षक सम्मेलन के दौरान डॉ. संजयन त्रिपाठी के पक्ष में शिक्षकों की राय बनती दिखाई दी। उस समय डॉ. संजयन त्रिपाठी भाजपा से उम्मीदवारी की संभावना को लेकर आशान्वित थे, लेकिन बाद में उन्हें भाजपा से टिकट नहीं मिला। शिक्षक समुदाय के एक हिस्से के लिए यह घटनाक्रम निराशाजनक रहा। इसने चुनाव की दिशा को भी प्रभावित किया और संभावित प्रत्याशियों के बीच बन रहे समीकरणों को नए सिरे से चर्चा में ला दिया।
इस चुनाव की एक प्रमुख विशेषता यह रही कि शिक्षक निर्वाचन, जो पहले मुख्यतः शिक्षक संगठनों और उनके बीच के आपसी समीकरणों के आधार पर लड़ा जाता था, इस बार स्पष्ट राजनीतिक रंग में दिखाई दिया। भाजपा ने पूर्व विधान परिषद सदस्य ध्रुव कुमार त्रिपाठी पर भरोसा जताया, जबकि समाजवादी पार्टी ने डॉ. संजयन त्रिपाठी को अपना प्रत्याशी घोषित कर दिया। इस प्रकार मुकाबले में दो प्रमुख राजनीतिक दलों की सीधी भूमिका सामने आ गई। इसके बाद दोनों दलों की ओर से शिक्षकों के बीच बैठकें, सभाएं और प्रचार अभियान तेज हुए। अपने-अपने प्रत्याशी के समर्थन में शिक्षकों को लामबंद करने के प्रयास किए गए।
कुशीनगर में चुनावी गतिविधियों को देखते हुए एक समय ऐसा प्रतीत होने लगा था कि मुकाबला मुख्य रूप से भाजपा और समाजवादी पार्टी के बीच सिमट गया है। कुछ स्थानों पर ध्रुव कुमार त्रिपाठी की स्थिति मजबूत मानी जा रही थी, जबकि डॉ. संजयन त्रिपाठी के पक्ष में भी समर्थन जुटाने के प्रयास लगातार जारी थे। इस राजनीतिक ध्रुवीकरण के बीच राजीव यादव की स्थिति को लेकर भी तरह-तरह के आकलन सामने आते रहे। कहीं वे कमजोर पड़ते दिखाई दिए तो कहीं उनके पक्ष में अंदरूनी समर्थन की चर्चा बनी रही।

यहीं इस चुनाव का सबसे दिलचस्प पहलू सामने आता है। चुनावी सभाओं और सार्वजनिक प्रचार में जो तस्वीर दिखाई देती है, जरूरी नहीं कि मतदान के समय भी वही स्थिति हो। शिक्षक निर्वाचन में व्यक्तिगत संपर्क, पुराने संबंध, स्थानीय पहचान और मतदाता बनाने के लिए किए गए प्रयास भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। राजीव यादव के मामले में यही पहलू चर्चा में रहा। मतदाता सूची में नाम जुड़वाने के लिए उनके द्वारा किए गए प्रयासों का लाभ उन्हें कितना मिला, इसका उत्तर तो मतगणना के बाद ही मिलेगा, लेकिन इस मुद्दे की चर्चा से इतना जरूर स्पष्ट होता है कि चुनाव में उनका प्रभाव पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू यह भी रहा कि जनपद के कई पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता राजीव यादव के समर्थन में खुलकर सामने आए। लोगों से उनके पक्ष में मतदान की अपील करते हुए भी वे दिखाई दिए। यह समर्थन चुनावी परिणाम को कितना प्रभावित करेगा, इसका अभी अनुमान लगाना जल्दबाजी होगी। फिर भी इससे यह संकेत जरूर मिलता है कि मुकाबला केवल राजनीतिक दलों के घोषित प्रत्याशियों के बीच प्रचार की ताकत का नहीं था, बल्कि स्थानीय स्तर पर व्यक्तिगत संपर्क और सामाजिक समर्थन की भी अपनी भूमिका थी।

मतदान के अंतिम चरण तक भाजपा और समाजवादी पार्टी के प्रत्याशियों को लेकर दो ध्रुवों की चर्चा प्रमुख बनी रही। इसके बावजूद जनपद के भीतर एक ऐसे अंडरकरंट की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता, जो सार्वजनिक चुनावी विमर्श में उतना दिखाई नहीं देता। राजीव यादव के पक्ष में मतदाता बनाने के प्रयासों और उनके समर्थन में सक्रिय लोगों की मौजूदगी को इसी संदर्भ में देखा जा सकता है। हालांकि, यह मान लेना उचित नहीं होगा कि चर्चाओं और समर्थन के आधार पर किसी प्रत्याशी की वास्तविक स्थिति का सटीक अनुमान लगाया जा सकता है। मतदान की गोपनीयता के कारण मतदाताओं की वास्तविक पसंद का पता मतगणना से पहले नहीं लगाया जा सकता।

इसी क्रम में एक और दिलचस्प चर्चा सामने आई। जनपद के कुछ शिक्षकों से बातचीत में यह बात सुनने को मिली कि एक अन्य प्रत्याशी ने मतदाताओं से दूसरे क्रम का वोट अपने पक्ष में देने की अपील की थी। यदि यह आकलन सही है, तो इससे चुनाव के बहुस्तरीय समीकरणों की ओर संकेत मिलता है। शिक्षक निर्वाचन में मतपत्र पर वरीयता क्रम का महत्व होता है। ऐसे में किसी प्रत्याशी की रणनीति केवल प्रथम वरीयता के मतों तक सीमित न होकर दूसरी वरीयता के मतों को लेकर भी हो सकती है। हालांकि, इस तरह की चर्चाओं से किसी प्रत्याशी की वास्तविक स्थिति का निष्कर्ष निकालना संभव नहीं है। मतों की वरीयता और उनकी गणना के बाद ही इस पहलू की वास्तविक तस्वीर स्पष्ट होगी।
कुशीनगर की चुनावी गतिविधियों को समग्रता में देखें तो यह मुकाबला कई स्तरों पर दिलचस्प दिखाई देता है। एक तरफ भाजपा और समाजवादी पार्टी की संगठनात्मक ताकत तथा राजनीतिक प्रभाव था, तो दूसरी तरफ स्थानीय प्रत्याशियों की व्यक्तिगत पहुंच, शिक्षकों से संपर्क और उनके बीच बने संबंधों की भूमिका भी थी। राजनीतिक दलों के प्रचार ने चुनाव को दो प्रमुख ध्रुवों में बांटने का प्रयास किया, लेकिन इससे यह जरूरी नहीं हो जाता कि मतदाताओं की पसंद भी उसी अनुपात में बंटी हो। शिक्षक समुदाय के भीतर अलग-अलग विचार और प्राथमिकताएं इस चुनाव को अपेक्षाकृत जटिल बनाती हैं।
फिलहाल, इन तमाम चर्चाओं और अनुभवों के आधार पर किसी एक प्रत्याशी की जीत या हार का दावा करना उचित नहीं होगा। यह आकलन जनपद में देखी गई गतिविधियों और विभिन्न लोगों से हुई बातचीत से निकला व्यक्तिगत निष्कर्ष है, न कि किसी सर्वेक्षण या आधिकारिक आंकड़े पर आधारित अनुमान। कुशीनगर के शिक्षकों ने मतपेटियों में किसे कितना समर्थन दिया है, यह 27 अक्टूबर को मतगणना के बाद ही स्पष्ट होगा। साथ ही, गोरखपुर-फैजाबाद खंड के अन्य जनपदों में बने समीकरणों का असर भी अंतिम परिणाम को समझने में महत्वपूर्ण होगा।

कुल मिलाकर, कुशीनगर में शिक्षक एमएलसी चुनाव को केवल भाजपा और समाजवादी पार्टी के बीच सीधी लड़ाई मानकर देखना अधूरा आकलन हो सकता है। राजनीतिक ध्रुवीकरण के बीच स्थानीय प्रत्याशियों की सक्रियता, व्यक्तिगत संपर्क और संभावित अंडरकरंट ने मुकाबले को रोचक बनाया है। अब देखना यह है कि मतपेटियों में बंद शिक्षकों का फैसला सार्वजनिक चर्चाओं और राजनीतिक आकलनों की पुष्टि करता है या चुनाव परिणाम कोई नया समीकरण सामने लाता है। इसका उत्तर 27 अक्टूबर को मिलेगा।
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