IIT पटना के शोधकर्ताओं की पहल:- मिथिला के मखाना के छिलकों से कमजोर मिट्टी को मजबूत बनाने की नई संभावना।
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Published - 26 October 2026 36 views

कुशीनगर/पटना । मिथिला का प्रसिद्ध मखाना अब निर्माण क्षेत्र में भी उपयोगी साबित होने की संभावना जगा रहा है। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) पटना के शोधकर्ताओं ने मखाना के छिलकों से तैयार राख के इस्तेमाल से कमजोर मिट्टी की मजबूती बढ़ाने और उसके फूलने-सिकुड़ने की समस्या कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण शोध किया है। इस शोध के निष्कर्ष अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका *Discover Civil Engineering* में प्रकाशित हुए हैं।
इस शोध की शुरुआत वर्ष 2022 में IIT पटना के सिविल एवं पर्यावरण अभियांत्रिकी विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. रामकृष्ण बाग के मार्गदर्शन में एक स्नातक परियोजना के रूप में हुई। बाद में, IIT पटना में जियोटेक्निकल इंजीनियरिंग में एमटेक के छात्र रहे उत्कर्ष श्रीवास्तव ने अपने शोधकार्य के तहत इस अध्ययन को आगे बढ़ाया। वह शोध पत्र के प्रथम लेखक हैं। उनकी एमटेक परियोजना को संस्थान प्रवीणता पुरस्कार से सम्मानित किया गया । तथा शोध के प्रयोगशाला परीक्षणों में तत्कालीन पीएचडी शोधार्थी डॉ. शैलेष कुमार यादव ने महत्वपूर्ण मार्गदर्शन दिये हैं, जबकि कंप्यूटर आधारित मॉडलिंग में IIT पटना के पीएचडी शोधार्थी लोकेश शरण श्रीवास्तव ने योगदान दिया है।
आईआईटी पटना के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. रामकृष्ण बाग के अनुसार, मखाना के छिलकों से तैयार राख मिट्टी के गुणों में सुधार के लिए एक संभावित विकल्प हो सकती है। यह पहल मखाना प्रसंस्करण से निकलने वाले छिलकों का उपयोगी निर्माण सामग्री के रूप में इस्तेमाल करने के साथ-साथ स्थानीय संसाधनों के बेहतर उपयोग को भी बढ़ावा दे सकती है।

काली कपास मिट्टी नमी मिलने पर फूलती है और सूखने पर सिकुड़ती है। इस कारण इमारतों की नींव और सड़कों की संरचना प्रभावित हो सकती है। अध्ययन में मखाना के छिलकों से तैयार राख को मिट्टी में मिलाकर उसके विभिन्न गुणों का परीक्षण किया गया। परीक्षणों में मिट्टी की मजबूती में सुधार और फूलने-सिकुड़ने की प्रवृत्ति में कमी के संकेत मिले। कंप्यूटर आधारित विश्लेषण में भी नींव की भार वहन क्षमता में सुधार की संभावना सामने आई।
यह शोध मिथिला के मखाना प्रसंस्करण से जुड़े स्थानीय संसाधनों को निर्माण क्षेत्र से जोड़ने की दिशा में एक नई संभावना प्रस्तुत करता है। हालांकि, वास्तविक निर्माण कार्यों में इसके व्यापक उपयोग से पहले क्षेत्रीय परीक्षणों और दीर्घकालिक प्रदर्शन का आकलन आवश्यक होगा। इस नवीन शोधकार्य की जानकारी एसोसिएट प्रोफेसर डॉ रामकृष्ण बाग के हवाले से आईआईटी पटना में शोधार्थी कुशीनगर जनपद निवासी डॉ शैलेष कुमार यादव ने दूरभाष पर दी है
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