आधुनिक कविता और मुक्तिबोध पर बी एच यू में संगोष्ठी आयोजित।
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Published - 28 February 2026 16 views

कु. रोशनी, शोध छात्रा बीएचयू✍️
वाराणास । सागर विश्वविद्यालय से पधारे डॉ. मिथिलेश शरण चौबे ने ‘अंधेरे में’ का नामवर - विवेचन विषय पर अपनी बात रखी। इन्होंने नामवर जी ने ‘अंधेरे में’ कविता पर लिखा है, और अन्य आलोचकों ने ‘अंधेरे में’ कविता पर जो आलोचना लिखा है दोनों ही संदर्भों में अपनी बातें रखते हुए कहते हैं कि ‘अंधेरे में’ कविता का मूल ध्येय अस्मिता की खोज है। इस कविता का कथ्य गहरी अर्थवत्ता का सूचक है। अंधेरे में कविता में अस्तित्व की सुगन्ध मानवीयता के रूप में आती है। मुक्तिबोध की दृष्टि भविष्य तक विस्तृत है। कवि मुक्तिबोध के लिए अस्मिता की खोज व्यक्ति की खोज नहीं, बल्कि अभिव्यक्ति की खोज है। मुक्तिबोध की कविता में विराट लोक बिंब उपस्थित है। नेमिचन्द्र जैन, रामविलास शर्मा इत्यादि आलोचकों ने भी इस कविता की विस्तृत समीक्षा की है। नामवर जी इस कविता में रहस्यवाद और अस्तित्ववाद के भावबोध को भी महसूस करते हैं। उनके काव्य का मुख्य उद्देश्य है अस्मिता की खोज नहीं, अस्मिता का विलय। हम कविता को केवल किसी एक घटना से हमेशा निबद्ध करके नहीं लिख सकते। अंधेरे में कविता आधुनिक कविताओं में सबसे गुरुतर ठहरते हैं। नामवर जी को दूसरा लेख क्यों लिखना पड़ा क्योंकि इस कविता को कई आलोचक प्रश्नांकित कर चुके थे। नामवर जी का मानना था कि अंधेरे में का ‘मैं’ और ‘रक्तस्नात पुरुष’ स्वयं मुक्तिबोध नहीं है। नामवर जी ने कहा था कि मुक्तिबोध शब्द और कर्म दोनों ही स्तरों पर अभिव्यक्ति की खतरे को उठाने की बात की थी। नामवर जी के विश्लेषण में जो दो मूल स्थापनाएं हैं। परम अभिव्यक्ति प्राप्त करना नहीं बल्कि उसे प्राप्त करने के लिए निरंतर प्रयत्न करते रहना है। अंधेरे में कवि देखने की स्थिरता के पार जाता है जिसे आसानी से देखा नहीं जा सकता है। मुक्तिबोध अपने समय में अपने समय का औचित्य विचार करने की कोशिश कर रहे थे। पुरुषोत्तम अग्रवाल जी ने कहा है कि नामवर की केन्द्रीय चिंता साहित्य ही रही है, इसी को ध्यान में रखकर उन्होंने अपनी आलोचना का उपक्रम किया है।

प्रो. बसन्त त्रिपाठी ने प्रगतिशील कविता का मूल्यांकन और नामवर सिंह विषय पर अपनी बात रखी। शुक्ल के समान ही नामवर जी भी साहित्य की सृजनात्मकता से आलोचना की दुनिया प्रस्थान करते हैं। ‘पूजा की थाली’ का रूपक नामवर जी कविताओं में आता है। नामवर जी की कविता की भाषा और उसके कथ्य पर हमें गौर करना चाहिए। उनकी कविताएं प्रकृति और आम जनमानस को केंद्र में रखकर लिखी गई है। प्रगतिशील कविता से नामवर जी की आलोचनात्मक मानस का विकास होता है। निराला और तुलसीदास से उनके मानस का विस्तार होता है। प्रगतिशील कविता की स्थापना को यदि देखना हो तो नामवर जी की पुस्तक आधुनिक साहित्य की प्रवृत्तियाँ की तरफ जाना चाहिए। प्रकृति, लोक, भाषा और प्रेम को प्रगतिशील कविता की आलोचना में वे मुख्य रूप से रखते हैं। प्रकृति का सहारा प्रगतिशील कवि अक्सर मन के दबे कुचले भाव को प्रकट करने के लिए लेता है। लोक के साथ शिष्ट समाज का सम्बन्ध कट सा गया है इसीलिए कविता महत्वपूर्ण ही बन पाती हैं। नागार्जुन को आधुनिक हिन्दी कविता का सबसे बड़ा जनकवि कहते हैं। वे लिखते हैं जिस तरह छायावाद और छायावादी कविता भिन्न नहीं है उसी तरह प्रगतिशील कविता प्रगतिवाद से भिन्न नहीं है। नामवर जी का आलोचनात्मक मानस के निर्माण में प्रगतिशील कविता की मुख्य भूमिका है क्योंकि उनकी अभिरुचि प्रगतिशील कविता के प्रति थी। केदारनाथ अग्रवाल की उपेक्षा नामवर जी ने भी किया था। कविता में पहली बार व्यापक सहानुभूति का प्रवेश प्रगतिवादी कविता से होता है। उसमें उच्च कोटि की नैतिकता को प्रतिष्ठित की गई। और इसमें उच्च कोटि की बौद्धिकता भी है। मुक्तिबोध ने कविता के संदर्भ में त्रिकोणीय विचार प्रस्तुत किए थे, जिसमें बाह्य जगत, अन्तर्जगत के साथ ही उसके केन्द्र में विचारधारा मुख्य है। भक्तिकाव्य, परम्परा और कबीर निबन्ध में लिखते हैं, तुलसी और कबीर की वेदना केवल दरिद्र और जुलाहा होने तक ही नहीं थी बल्कि यह वेदना आध्यात्मिक वेदना अधिक थी। प्रगतिशील कविता की आलोचना के सन्दर्भ में नामवर जी में सबसे कम अंतर्विरोध से ग्रसित होते हैं। नागार्जुन के सन्दर्भ में लिखते हैं राजनीतिक कविता लिखना सबसे कठिन कला है। राजनीतिक कविताओं में घटनाओं का उल्लेख ओवरलेप हो सकता है जैसी नामवर ने अच्छे से साधा है। त्रिलोचन इसलिए अपेक्षाकृत कम लोकप्रिय रह गए क्योंकि उन्होंने राजनीतिक कविता उतनी सघनता से नहीं लिखी है। नागार्जुन कहते हैं कवि या कलाकार होना पर्याप्त नहीं है बल्कि पक्षधर की भूमिका धारण करो। प्रगतिवाद में ग्राम प्रकृति का वास्तविक रूप उभर कर आया है। गांव के वास्तविक चित्रण प्रगतिवादी कविताओं में है। इससे पूर्व इस तरह का चित्रण कहानी और उपन्यासों में ही देखने को मिलता था। इन कवियों ने लोक और गांव की उसी भाषा में सामने रखा जिस भाषा में वह व्यक्त हो सकता है। प्रगतिवादी कविता की अनगढ़ता में भी सौंदर्य है। प्रगतिवादी कविता ने अनगढ़पन को साधा है।

लखनऊ विश्वविद्यालय से आएं प्रो. अनिल त्रिपाठी ने नयी कविता का मूल्यांकन और नामवर सिंह विषय पर अपनी बात रखते हुए कहा कि नामवर जी का अटूट विश्वास था कि किसी कृति की अटूट आलोचना से गुजरना है तो वह अंतर से ही जाएगी। अर्थात् पाठ केन्द्रित आलोचना नामवर जी की आलोचना का बुनियादी पक्ष है। प्रगतिशील आलोचना का स्वरूप शुरू में यांत्रिक किस्म का था उन्होंने अपनी आलोचना के माध्यम से इस यांत्रिकता को ध्वस्त करने की कोशिश की। ग्रीक माइथोलॉजी को लेनिन छोड़ देते हैं और इसका शिरा मार्क्स पकड़ते हैं। नामवर जी के लिए साहित्य बुनियादी चीज है। साहित्य के आलोक में विचार को लाइए न कि विचार के आलोक में साहित्य को। आप को साहित्य को केवल विचारधारा में समेट दें, आप साहित्य को केवल राजनीतिक चेतना में समेट थे ये उचित नहीं। साहित्यिकता और सामाजिकता के संतुलित रूप को नामवर जी एक साथ देखते हैं। कविता के नए प्रतिमान नामवर जी का सबसे शास्त्रीय ग्रंथ है। नेमिचन्द्र जैन ने कहा था कि कविता के प्रतिमान में नामवर जी झुकाव रूपवाद की ओर अधिक हो गई है। प्रयोगवाद, अस्तित्ववाद को प्रगतिवाद के प्रतिक्रिया स्वरूप हमारे यहां देखा गया है, जबकि अस्तित्ववाद के प्रवर्तक सार्त्र पहले मार्क्सवादी थे। नई कविता में प्रतिमान की तुलना में मूल्यों पर अधिक जोर है। संस्कार शब्द से नामवर जी को चिढ़ नहीं है, क्योंकि कविता पाठ करना भी अपने आपमें एक संस्कार है। रचना के धरातल पर व्यापकता और गहराई की बात नामवर जी ने की है। उस दौर में आने वाली तमाम शब्दावलियों के भीतर नामवर जी उतरते हैं। मूल्यवान है एक भी ऐसे आलोचक का होना जो अच्छी चीज को वास्तव में अच्छी कहे। नामवर जी ने कहा कि छायावाद कवियों में सबसे पहले पंत की प्रतिष्ठा हुई, उसके बाद प्रसाद, महादेवी की प्रतिष्ठा हुआ और सबसे अन्त में निराला की प्रतिष्ठा होती है। स्वायत्तता में अस्मिता और सापेक्षिक स्वतंत्रता होनी चाहिए। जड़ीभूत सौंदर्यानुभूति से लड़ने के लिए लगातार जद्दोजहद करनी पड़ेगी। वे साहित्य में हमेशा इस बात पर बल देते रहे कि विचार से ज्यादा जीवन महत्त्वपूर्ण है।
प्रतिष्ठित आलोचक प्रो. कृष्णमोहन सिंह ने मुक्तिबोध का मूल्यांकन और नामवर सिंह विषय पर व्याख्यान दिया। नामवर जी की आलोचना का विकास एक प्रक्रिया में जाकर गुणात्मक विकास में बदल जाता है। मार्क्स को भी आरंभिक मार्क्स और परवर्ती मार्क्स में भी देखने की प्रवृत्ति है। नामवर जी के प्रारंभिक लेखन से बाद वाले लेखन की तुलना करनी चाहिए। नामवर जी के प्रारंभिक लेखन पर भी ध्यान केन्द्रित करना चाहिए। मार्क्सवाद की यदि इतनी चिंता है तो उसके भटकाव और उदारता पर बात करनी चाहिए। घिसी पीटी बातों को कहने से बचना चाहिए। हमारे समाज के सामने जो बड़े वैचारिक मुद्दे हैं, उनकी बहुत कुछ पहचान आज से सत्तर पचहत्तर साल पहले इन विचारकों ने अपने ढंग से की थी। मुक्तिबोध आधुनिकता कविता का अंत के पूछते हैं क्या हम नए भावबोध को नए मूल्यबोध में परिणत नहीं कर सकते हैं। उनका कहना है कि हमारी भावनात्मक प्रतिक्रिया कवि बार आधुनिक भावबोध में हो जाता है तो उसे आधुनिकता कह देते हैं जबकि उसे दर्शन और मूल्यबोध के रूप में प्रतिष्ठित करना चाहिए तभी आधुनिकता को समाज में प्रतिष्ठित कर सकते हैं। नए सामाजिक मूल्यों के लिए कोई संघर्ष है कि नहीं इसे परिवार नामक संस्था में देखना चाहिए। हमारे विचार, हमारी रचनाएँ यदि जीवन मूल्यों से प्रेरित नहीं तो वह व्यर्थ है।। हमारा जीवन न तो पूरे तौर पर सामंती ढंग से चलता है और न हीं आधुनिक ढंग से चलना है। मुक्तिबोध का मानना है कि आधुनिक और परम्परागत दोनों मूल्यों के प्रति ईमानदार होना चाहिए। प्रेम के प्रति ईमानदार होना मुश्किल तो है ही लेकिन घृणा के प्रति ईमानदार होना ज्यादा मुश्किल है। एक समझौतहीन ढंग से हमें इसमें आगे आना चाहिए। नामवर जी ने इस पर कहा था मुक्तिबोध ने बहुत सही समय पर बहुत सही बात कही है। मन , वचन और कर्म के आधार पर विचारधारा का निर्माण होना चाहिए।
इस सत्र का संचालन डॉ. विवेक सिंह कर रहे थे। वे बताते हैं कि नामवर जी कवि पहले हैं, आलोचक बाद में और उसके बाद में वे मार्क्सवादी हैं। नामवर जी के साथ मुक्तिबोध थे, शमशेर थे, त्रिलोचन थे इनके सान्निध्य में नामवर जी ने सृजनात्मकता को सबसे अधिक महसूस किया है।
कु. रोशनी शोध छात्रा, बीएचयू।
नामवर जी काशी के विभूति थे ~ प्रसिद्ध संस्कृतकर्मी प्रो. अवधेश प्रधान
छठवां सत्र : हिन्दी आलोचना का मूल्यांकन
प्रसिद्ध सांस्कृतिकर्मी प्रो. अवधेश प्रधान ने नामवर सिंह के रामचन्द्र शुक्ल विषय पर बोलते हुए कहा कि। उन्होंने कहा कि इसमें संदेह नहीं कि वे काशी के विभूति थे। नामवर जी ने काशी के मधुचक्रों को छककर निचोड़ा। नामवर जी की उमड़ती हुई यादें एक तरफ़ है और उनके प्रति हमारा कर्त्तव्य एक तरफ है। जो आसानी से लांघ जाते हैं उन्हें गहराई की थाह क्या जान पाएंगे, उस गहराई की थाह तो मंदराचल ही गहराई तक जाकर बता सकता है। हिन्दी ने हमें चार चार मंदराचल दिए हैं। आचार्य रामचंद्र शुक्ल, आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी, नामवर सिंह, रामविलास शर्मा और पांचवें हैं नन्ददुलारे वाजपेई। वाजपेई जी की भाषा पर एकत्र अधिकार था। नंददुलारे वाजपेई ने पहली बार नामवर जी के अंतर्विरोध को उजागर किया, उनके जीवनकाल में ही। हिन्दी साहित्य के इतिहास में अपने शिष्यों का नाम लेकर रामचंद्र शुक्ल जी ने धन्य धन्य कर दिया, केवल एक शिष्य का नाम नहीं लिया वो थे नन्ददुलारे वाजपेई। वे भी एक मंदराचल थे। 1950 के बाद उन्होंने आचार्य रामचन्द्र शुक्ल पर सबसे अधिक सोचा, विचारा। 1950 से शुक्ल जी की भाषा की गुरुता नामवर जी की भाषा में आने लगी। नामवर जी को सत्तर साल तक काम करने का मौका मिला। ये वे मंदराचल है जिन्होंने पाताल की थाह ली। 1950 का पहला लेख है रामचंद्र शुक्ल पर। दूसरी परम्परा को लिखने के बाद उनका बड़ा मन था कि आचार्य शुक्ल पर लिखें। शुक्ल जी ने उन्होंने लिखने का गंभीर प्रयास किया लेकिन वे लिख नहीं पाए। जिस आलोचक पर वे गंभीर रूप से लिख नहीं पाए वे आचार्य शुक्ल थे। नामवर जी ने स्वयं के निर्माण में खूब तपस्या की है। जैसे रवींद्रनाथ के बाद बंगला में चमकता हुआ सितारा नहीं दिखाई देता है वैसे ही चमकते हुए सितारा आचार्य शुक्ल हैं। नामवर जी ने कहा है कि हिंदी की नई समीक्षा पद्धति का निर्माण करने के लिए आचार्य शुक्ल को पढ़ना जरूरी है। शुक्ल जी का अभिव्यक्तिवाद ही उनकी सीमा बन गई। दूसरी सीमा थी प्रबंध और मुक्तक का। मुक्तक को मध्यम काव्य के दर्जा किया। इसका आलंबन मानव को, प्रकृति को माना। नंद दुलारे वाजपेई ने कहा था, कविता में मैथिली शरण गुप्त , आलोचना में आचार्य शुक्ल और कथा सहित में प्रेमचंद द्विवेदी युगीन नैतिकता से ग्रसित थे। नामवर जी कहना था कि युग प्रगीत मांग रहा था और शुक्ल जी उन्हें महाकाव्य देने पर तुले हुए थे। चिंतामणि भाग तीन का अद्भुत संपादन नामवर जी ने किया है।। बकलम खुद में नामवर जी लिखते हैं कि भूमिका लिखनी हो तो शुक्ल जी जैसी लिखनी चाहिए। चिंतामणि भाग तीन का संपादन करते हुए नामवर जी ने ऐसी ही भूमिका लिखी है। शुक्ल जी ने जितने अनुराग से भारतेंदु युग पर लिखा है उसके विपरीत द्विवेदी युग पर लिखा है। काव्य में रस सिद्धांत नामवर जी की सौंदर्यदृष्टि और शुक्ल जी के प्रति कुछ लिखने की अधीरता को रेखांकित करता है। हमारे देश के स्वाधीनता के इतिहास में हिन्दी का भी योगदान है इस पर गर्व होना चाहिए। आज चन्द्रशेखर आजाद का जन्म दिवस है। गोकुलनाथ ने लिखा है यहीं रवींद्रपुरी कालोनी के घर में शेखर मिलने आते थे, एक साक्षात्कार रूप में गोकुलनाथ जी द्वारा लिखा गया संस्मरण है।
डॉ. योगेश प्रताप शेखर ने दूसरी परम्परा और हजारी प्रसाद द्विवेदी विषय पर व्याख्यान दिया। उन्होंने बताया कि द्विवेदी और नामवर सिंह दोनों ही जनों में अस्वीकार्य का साहस है। हमारी साहित्यिक परम्परा और भारतीयता शीर्षक पर व्याख्यान देते हुए कहते हैं कि परंपरावाद इस बात पर बल देता है कि देश में बस एक परंपरा है। जबकि भारत में कई परंपराएं हैं। और भारत के हर नागरिक को अपनी परंपरा चुनने का अधिकार है। द्विवेदी जी और नामवर जी के यहां परम्परा बहुलता में है। द्विवेदी जी जब शांतिनिकेतन में थे तब अशोक का फूल लिखते हैं और जब उन्हें चंडीगढ़ जाना पड़ा तो कुटज लिखते हैं। ये दोनों ही लेखक अपने व्यक्तिगत समस्या को भी बड़े स्तर पर देखते हैं। वे अपने व्यक्तिगत समस्या को व्यापक सामाजिक समस्या से जोड़ देते हैं। अशोक का फूल कितना भी सुंदर हो लेकिन वह सामंती प्रवृत्ति का ही है। संस्कृति, परम्परा की निर्मिति की बनावट को लेकर दोनों ही जन सचेत है। आलोचना का काम है परम्परा की रक्षा करना। आखिरकार हम परम्परा का मूल्यांकन करेंगे कैसे ? मूल्यांकन करते हुए हम एक विशेष दृष्टि को तवज्जो देने लगते है। परम्परा के बारे में एक दृष्टि है उसे लगातार समकालीन बनाते जाना, प्रासंगिकता से जोड़ना। दूसरी दृष्टि है, अतीत की अतीतता को बनाए रखते हुए, वर्तमान को अतीत से पार्थक्य प्रदान करना। द्विवेदी जी परम्परा को एक सतत विकास के रूप में देखते हैं जबकि नामवर जी कहते हैं, समूचे हिंदी साहित्य ने अपनी जो पहचान बनाई है वह नए और पुराने के द्वंद्व से बनाई है, समन्वय या संयोग से नहीं। परम्परा का विकास नए और पुराने के द्वंद्व से विकसित है। द्विवेदी जी के बारे में नामवर जी एक और बात कहते हैं कि द्विवेदी जी ने अपने संग्रह का नाम रखा कल्पलता, जबकि इस नाम से संग्रह में कोई निबन्ध नहीं है। सारा साहित्य उनके लिए गल्प ही है। द्विवेदी जी की शैली व्यास शैली है।
प्रो. सियाराम शर्मा ने रामविलास शर्मा का नामवर - विवेचन पर अपनी बातें रखीं। रामविलास शर्मा ने समस्त हिन्दी साहित्य की मुकम्मल आलोचना प्रस्तुत की। हिन्दी आलोचना नामवर जी ऐसे रामविलास शर्मा के वाद विवाद और संवाद से भी विकसित हुई है। मार्क्सवाद की थियरी थीसिस, एंटीथिसिस और सिंथेसिस को विवेचित करने का हिंदी में वाद विवाद और संवाद शब्द उचित ही है। 1982 में केवल जलती मशाल लेख में नामवर जी ने रामविलास शर्मा के महत्व को समझने की कोशिश की गई। 2001 में इतिहास की शब्द साधना में रामविलास शर्मा को ध्वस्त करने की कोशिश है। नामवर जी ने कहा कि रामविलास शर्मा हिन्दी जाति के अप्रतिम आलोचक हैं। उनके चिन्तन के केन्द्र में 1857 की भूमिका रही है। 1857 को प्रथम स्वाधीनता संग्राम घोषित करने में रामविलास जी की महत्वपूर्ण भूमिका है। सबसे बड़ी बात है कि नामवर जी ने इस लेख में हिन्दी की अपने नवजागरण की खोज की। इसके पहले बंगाल के परिप्रेक्ष्य में नवजागरण को देखा जा रहा था। रामविलास जैसा महत्त्वपूर्ण आलोचक जब दस साल भाषा पर लगाता है। प्राचीन भारत में भाषा परिवार और हिन्दी पुस्तक तीन खंडों में लिखी। नामवर जी कहते हैं यह ऐसी किताब है जिसकी अभी तक हिन्दी में आलोचना नहीं हुई है, इतना गुरुतर किताब है यह। कविता और मार्क्सवादी आलोचना को केन्द्र में रखकर निराला की जैसी आलोचना की है, उन पर लेखन किया है वह विश्वसाहित्य में अप्रतिम है। इसका अंग्रेज़ी अनुवाद होता तो यह विश्व स्तर पर प्रतिष्ठित होती। नामवर जी कहते हैं रामविलास शर्मा हिन्दी के सीमित आलोचक नहीं है। उस समय रामविलास जी ने सांस्कृतिक समीक्षा करने का कार्य उस समय किया है। इतिहास की शुतुरमुर्गी प्रवृत्ति से ये आलोचक दूर रहे हैं। उन्होंने इतिहास में सुधार का काम भी किया। इस तरह की भारतीय व्यवस्था , बंद व्यवस्था नहीं थी। इतिहास के क्षेत्र में बहुत ही मौलिक चिंतन रामविलास जी ने किया। वे अंग्रेज़ी छोड़कर हिन्दी में आते है, जनता की भाषा में लिखते हैं। रामविलास जी की दृष्टि गरुड़ दृष्टि थी।
नामवर जी कहते हैं अपने एक अन्य लेख में रामविलास की प्रारंभिक किताबें उनकी मार्क्सवाद से शुरू होती थी और बाद के दिनों में वे ऋग्वेद से शुरू करते हैं। वे कहते हैं कि यूरोप में तो नवजागरण की एक ही श्रृंखला है जबकि भारतीय सन्दर्भ में चार तरह के नवजागरण की बात है, उनके पास तो नवजागरणों की कई श्रृंखला है। वे सवाल उठाते हैं कि रामविलास जी के इन चारों नवजागरण में बुद्ध का कहीं ज़िक्र नहीं है। वे रामविलास जी को फंडामेंटलिस्ट कह देते हैं जो उचित नहीं है। जिस तरह से नामवर जी न आर्य समाज को खारिज किया एक तरह से यह उनके समग्रता की दृष्टि से उचित नहीं है। उन्होंने एक जगह कहा परम्परा सामंती प्रवृत्ति की होती है।
सत्र का संचालन डॉ. प्रभात कुमार मिश्र कर रहे थे। परम्परा बार-बार दोहराए जाने वाली अनवरत प्रक्रिया है। उन्होंने कहा कि नामवर जी ने द्विवेदी जी को आधार बनाकर दूसरी परम्परा की खोज पुस्तक लिखने के बहाने अपने आलोचना मूल्यों को स्थापित करने की कोशिश की। हर चीज का आप ध्रुवीकरण नहीं कर सकते हैं। ध्रुवीकरण करने के लिए आपको प्रतिपक्ष को जानने की आवश्यकता है। हिन्दी आलोचना में न जाने क्यों बार बार ऐसा ध्रुवीकरण किया गया है, जिसके कारण हमें पीछे जाकर उसे बार बार उस पर विचार करने की जरूरत है।
सातवाँ सत्र :- आधुनिकता, इतिहास
प्रो. विनोद तिवारी ने उपन्यास की भारतीयता का प्रश्न और नामवर सिंह विषय पर अपनी बात रखते हुए कहते हैं कि अखिल भारतीय मद्रास सम्मेलन में पहली बार अज्ञेग ने भारतीय उपन्यास की भारतीयता का प्रश्न उठाया है। वाचिक परम्परा का इतिहास बोध और लिखित परम्परा का इतिहासबोध भिन्न होगा। भारतीय कालबोध की अवधारणा अज्ञेय लेकर आते हैं। तो क्या भारतीय समय पाश्चात्य कठघरे के खांचे में ही होगा। नामवर जी ने बताया कि पाश्चात्य बोध की इतिहासबोध लेखन की जो पद्धति है वह यथार्थ से ज्यादा जुड़ती है। नामवर जी का लेख है अंग्रेज़ी ढंग के नॉवेल और हिन्दी उपन्यास। परीक्षागुरु के बारे में कहते हैं कि यह अंग्रेज़ी ढंग का पहला भारतीय इतिहास है। नामवर जी कहते हैं कि हिन्दी उपन्यास रोमांस के ज्यादा करीब है। कहते हैं बंकिमचंद्र चटर्जी इसके सिरमौर हैं। कपालकुंडला, दुर्गेश नंदिनी इत्यादि का जिक्र करते हैं। दुर्गेश नंदिनी रोमांटिक उपन्यास है। कपाल कुंडला में शुद्ध रोमांस है। हिन्दी में ठाकुर जगमोहन सिंह की श्यामा स्वप्न का जिक्र रोमांटिक उपन्यास के रूप में कहते हैं। पाश्चात्य में भी रोमांटिक उपन्यास लिखे जा रहे हैं। विनोद तिवारी जी ने कहा कि उपन्यास शुद्ध उपन्यास और शुद्ध रोमांस इन दोनों के सहमेल से उपन्यास बनाते हैं। फ्रांसीसी साहित्य में उपन्यास को रोमान कहते हैं, वहां इसका पूरा एक आंदोलन चला है। यह जो झगड़ा हो रहा है कि भारतीय ढंग का उपन्यास होगा। क्या निर्मल वर्मा का उपन्यास भारतीय ढंग का है ! क्या अज्ञेय का शेखर:एक जीवनी भारतीय ढंग है! भारत में जिस हम भारतीय या हिन्दी उपन्यास के रूप म तलाश रहे हैं, वह एपिक से जुड़ेगा या रोमांस से। देश, राष्ट्रीयता के संदर्भ में आनंदमठ और किसान , मजदूर से संबंधित उपन्यास । भारतीयता के सन्दर्भ में इन तीन तरह के उपन्यासों का जिक्र करते हैं।कपालकुंडला राष्ट्रीय स्वाधीनताबोध का उपन्यास है।

डॉ. राहुल सिंह ने नामवर सिंह का आधुनिकता बोध विषय पर अपनी बात रखी। आचार्य शुक्ल के यहाँ आधुनिकता में हिंदुत्व आनुषांगिकता के रूप में है। हिन्दी में प्रेमचन्द आधुनिकता को नए सिरे से विकसित करते हैं। नामवर जी आधुनिकता बोध उनकी दृष्टि में है । वे आधुनिकता को इनहेरीटेट करते हैं। आधुनिकता अपने आप में एक समग्रतामूलक अवधारणा है। इसमें हम किसी भी चीज को समग्रता में देखते हैं, जो किसी काम को पर्याप्त चुनौतीपूर्ण बनाता है। नामवर जी लगातार आधुनिकता में नए सूत्र और कोण विकसित करने का प्रयत्न करते हैं। नामवर जी के आधुनिकता बोध के स्वीकार्य के कई चरण रहे हैं। नामवर जी के आधुनिकता बोध में समकाल से ज़िरह करने की प्रवृत्ति भी है। रचना को ठोस सामाजिक पीठिका में रखकर चलना चाहिए। आधुनिक होना पूर्ववर्ती भ्रमों से क्रमशः मुक्त होना भी है। जाने हुए का पहचाना हुआ हो जाना, ऐसी क्षमता नामवर जी में है। धीरललीत, सवर्ण नायकों वाले समुदाय में प्रेमचन्द होरी जैसे नायक को, सूरदास जैसे नायक को नायकत्व प्रदान करते हैं। नामवर के आधुनिकता बोध में मार्क्सवाद के प्रगतिशील मूल्य केन्द्र में है। समकालीनता के साथ उनका एक मित्रवत सम्बंध है तथा दूसरा शत्रुवत सम्बन्ध भी है। नामवर जी की आधुनिकता में चार तरह कारक हैं,परम्परा बोध, ऐतिहासिकता सामाजिकता और सन्दर्भवत्ता।
डॉ. वैभव सिंह ने नामवर सिंह का इतिहासबोध पर अपनी बात रखी। नामवर जी के यहाँ विस्तार बहुत है। मध्यकालीन मूल्यबोध, परम्परा और आधुनिकता, इतिहास बोध, आधुनिकता, भारतीयता बहुत ही विस्तार है। नामवर जी हमेशा दृष्टि की बात करते हैं। अंततः सवाल दृष्टि का है, बहुत ज्यादा विस्तार का नहीं। वरना आलोचना शब्दों के जंगल में गुम हो जाती है। केवल उपन्यास और कविता ही तन्मय करने की क्षमता नहीं रखती बल्कि आलोचना भी तन्मय करने की क्षमता रखती है। नामवर सिंह के इतिहास पर कोई स्वतंत्र पुस्तक नहीं लिखी है। उनका मानना था साहित्य केवल साहित्यिक अवधारणा ही नहीं है बल्कि ऐतिहासिक अवधारणा भी है। इतिहास साहित्य का पालन करता है। इतिहास ही साहित्य को एक तरह से पालता है। ऐसा लगता है नामवर जी मध्यकाल का न केवल साहित्यिक इतिहास बल्कि राजनीतिक इतिहास भी लिखने की कोशिश कर रहे हैं। उस समय साहित्यकारों के बीच एक दृष्टि विकसित हुई थी कि हमें एक इतिहास गढ़ना है। जो इतिहास और इतिहास बोध आचार्य द्विवेदी जी देकर गए वह आज भी काम में आता है। एक विशुद्ध साहित्यिक समालोचक के तौर पर नामवर जी प्रतिष्ठित हो चुके थे, तब उनका मानना था कि आलोचक को रुचि का विस्तार करना पड़ता है। नामवर जी की आलोचना में कोल्हू का बैल की तरह वाली बात नहीं है। नामवर जी इतिहास बुद्धिजीवी, जन बुद्धिजीवी थे। इतिहास को देखने के लिए उनके पास विश्व मानवतावाद था, दूसरी दृष्टि प्रबोधनकाल से अर्जित की वह था मानववाद। मानवदेह केवल दंड भोगने के लिए नहीं बनी है, बाणभट्ट की आत्मकथा में सुचरिता का कथन है। यह आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के भीतर का मानववाद बोल रहा है। नामवर जी ने लोक और शास्त्र के द्वंद्व की तरफ तो ध्यान दिया लेकिन लोक के अंतर में जो अंतर्विरोध है, और शास्त्र के अंतर में जो अंतर्विरोध है उस पर नामवर की दृष्टि नहीं गई। नामवर जी ने कहा था आलोचना के लिए मैंने पसीना बहाया है। इतिहास बोध, आधुनिकता, इन सब को समझने हेतु हमें प्रतिभा का समाजशास्त्र भी विकसित करना पड़ेगा।सत्र का संचालन डॉ. सत्यप्रकाश सिंह ने किया।
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