बी एच यू में तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का समापन ।
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Published - 01 March 2026 17 views

वाराणसी। हिन्दी विभाग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के तत्वावधान में प्रख्यात प्रगतिशील आलोचक प्रो. नामवर सिंह की जन्मशती पर ‘नामवर सिंह आलोचना और वैचारिकता’ विषयक तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन 26-28 फरवरी 2026 को किया गया। संगोष्ठी के समापन सत्र की अध्यक्षता बीएचयू के हिन्दी विभागाध्यक्ष प्रो. वशिष्ठ द्विवेदी ‘अनूप’ ने की। हिन्दी के प्रख्यात सांस्कृतकर्मी तथा आलोचक प्रो. पुरुषोत्तम अग्रवाल ने समाहार वक्तव्य दिया।

यह समय आधुनिकता के मूल्यों के प्रत्यावर्तन का समय है ~ प्रसिद्ध संस्कृतकर्मी और आलोचक प्रो. पुरुषोत्तम अग्रवाल ।
मनुष्य का इतिहास केवल वर्ग संघर्ष का ही इतिहास नहीं है बल्कि वर्ग सहयोग का भी इतिहास है ~ प्रसिद्ध संस्कृतकर्मी और आलोचक प्रो. पुरुषोत्तम अग्रवाल ।
सभ्यताएं संवाद भी करती हैं, यह संवाद नामवर जी की आलोचना में प्रकट होती है ~ प्रसिद्ध संस्कृतकर्मी और आलोचक प्रो. पुरुषोत्तम अग्रवाल

अध्यक्षीय वक्तव्य देते हुए प्रसिद्ध ग़ज़लकार, बीएचयू के हिन्दी विभागाध्यक्ष प्रो. वशिष्ठ द्विवेदी ‘अनूप’ ने कहा कि इस संगोष्ठी में श्रद्धा तो थी लेकिन भक्ति नहीं थी। हर वक्ताओ ने अपने स्वभाव के अनुसार वक्तव्य दिया, यह बहुत अच्छी बात थी क्योंकि नामवर जी भी असहमतियों को अवसर देते हैं। हमने संस्मरणों से जाना जो व्यक्ति शिखर पर, जिसकी आभा से आज हम सिक्त हो रहे हैं, उनके जीवन में भी संघर्ष रहा है, टूटे चप्पल, डिबरियों का प्रकाश, मिट्टी के घर इन सबसे गुजरते हुए नामवर जी नामवर हुए हैं। धान को लेकर, फसलों को लेकर नामवर जी ने बहुत अच्छा लिखा है। नामवर जी ने लगभग पंद्रह से सोलह सालों तक गीत लिखें थे न जाने वह प्रकाशित हुआ कि नहीं हुआ। नींद के गीत नाम से एक संग्रह भी बनाया था उन्होंने। उसमें प्रेम के गीत थे, प्रगतिशीलता के गीत लिखे थे, दुःख दर्द के गीत लिखे थे। आर्थिक रूप से जब नामवर विपन्न थे, बेरोजगार थे, एक गीत लिखते हैं,
आज तुम्हारा जन्मदिवस , यूं ही यह संध्या
भी चली गई, किन्तु अभागा मैं न जा सका
समुख तुम्हारे और नदी तट भटका भटका
कभी देखता हाथ, कभी लेखनी अबंध्या
….. क्षमा करो वत्स, आ गया दिन ही ऐसा
आँख खोलती कलियाँ भी कहती हैं पैसा।
स्वागत वक्तव्य देते हुए डॉ. रवि शंकर सोनकर ने कहा कि इस तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी ने हमें नामवर सिंह जी की रचना संसार से सूक्ष्म रूप से परिचित करवाया। नामवर जी के आलोचना कर्म की विराटता इस संगोष्ठी के जरिए स्पष्ट हुई। उन्होंने सभी अतिथि वक्ताओं और विद्वानों का स्वागत किया।
इसके पश्चात् नामवर सिंह द्वारा रचित गीत ‘कभी जब याद आ जाते, नयन को घेर लेते घन, स्वयं में रह न पाते मन’ लहर के मूक अधरों पर, व्यथा बनती मधुर सिहरन, न दुःख मिलता, न सुख मिलता…कभी जब याद आ जाते..नयन को घेर लेता घन! दूसरा गीत जाने क्यों टूट रहा है तन, नयन को घेर लेते घन। घर के बरतन के खन खन में है टूट रहे दुपहर…जाने क्यों टूट रहा है मन की प्रस्तुति अभिषेक, मीमांसा और गजेन्द्र बहुत ही सुमधुर वाणी में की।

संगोष्ठी के समापन सत्र में प्रसिद्ध संस्कृतकर्मी और आलोचक प्रो. पुरुषोत्तम अग्रवाल ने समाहार वक्तव्य देते हुए कहते हैं कि नामवर जी का एक और रूप था जिसको परिचित होने का सौभाग्य मिला है वे हैं उनके क्लास रूम के विद्यार्थी। पानी पहले ही नेचुरल कमोडिटी की जगह बाजार कमोडिटी की वस्तु बन चुका है। आज आपको स्वच्छ पानी पीना है तो पैसा देना पड़ेगा। अमेरिका के एक विद्वान बर्नेस ने आर्टिफिशियली इंटेलिजेंस के मोनोपली पर प्रतिबंध लगाने की बात कही है क्योंकि आर्टिफिशल इंटेलिजेंस की दुनिया ने पानी को कंज्यूम करना शुरू किया है। इटालो काल्विनों ने लिखा है कि मनुष्य की चेतना में प्लेग बैठ गया है और इसका इलाज है पोएट्री। अभिव्यक्ति के अन्य माध्यमों के विपरीत भाषा आपके रोजमर्रा के जीवन का अंग है। शब्द का अर्थ भाषा में निवास करता है, सन्दर्भ में निवास करता है। भाषा वह क्षमता है जो मनुष्य को आत्मबोध देती है। कविता मनुष्य की रचनात्मकता को पाने का सबसे कारीगर उपाय है, ऐसा काल्विनों 1985 में ही कह रहे थे। आर्टीफिशियल इंटेलिजेंस मनुष्य की कल्पना को आउट सोर्स करने का काम है तो यह मनुष्य की आत्महत्या है। यदि सचमुच अपने काम में साहित्य आलोचक ईमानदार है तो आप दुनिया के ज्ञान से उसका संबंध होना ही चाहिए। मनोविज्ञान, दर्शन, अर्थविज्ञान इत्यादि के अध्ययन के प्रवृत्त होने पड़ेगा।गोदान में होरी नामक किसान के मन और आत्मा का भी वर्णन है। अब इस उपन्यास में मानव मन का चित्रण मनोविज्ञान की कसौटी पर न हो तो यह उपन्यास इतना गुरुतर बन पाता। नामवर जी जब आलोचना के स्वभाव पर बल देते हैं तब मुझे लगता है कि वे साहित्यिक और सांस्कृतिक दायित्व का निर्वहन कर रहे हैं। नामवर जी की कविता के नए प्रतिमान में आलोचना अपने पूर्ण वैभव में दिखती है। कविता के नए प्रतिमान का लेखक जितना कंफर्टेबल आनंदवर्धन के साथ है उतना ही इलियट के साथ भी। साहित्य की जो विशिष्ट सत्ता है, उसका रूप है, उसके वैचारिक रुझान तक आप कैसे पहुंचेंगे। व्यक्ति प्रेमचंद के बारे में हम कुछ नहीं कह सकते हैं लेखक प्रेमचंद के बारे में कह सकते हैं। यह बहस किस आधार पर होगी, जो कुछ प्रेमचंद ने लिखा है उसी आधार पर होगी फिर रूप को उपेक्षा कैसे हो सकती है।नामवर जी ने उत्तराधुनिकता के नजरिए से साहित्य को देखने की आलोचना की थी। नामवर जी की प्रतिक्रिया के केंद्र में रचना की समग्रता थी। यूरोपीय आधुनिकता के मूल्य, भारतीय आधुनिकता का मूल्य, आधुनिकता के सभी मूल्यों को संदिग्ध बनाया जा रहा है। यह समय आधुनिकता के मूल्यों के प्रत्यावर्तन का है। मनुष्य का इतिहास केवल वर्ग संघर्ष का ही इतिहास नहीं है बल्कि वर्ग सहयोग का भी इतिहास है। नामवर जी की एक महत्वपूर्ण पुस्तक है दूसरी परम्परा की खोज। इसका प्रकाशन 1982 हुआ था
दार्शनिक आर जी रानाडे ने राष्ट्रपति भवन में व्याख्यान दिए थे। कन्नड़ मराठी के आचार्यों पर उन्होंने व्याख्यान दिए थे जो पुस्तकाकार रूप में आई। आचार्य रानाडे ने कहा कि हिन्दी के जो कवि है वे अपने मौलिक दार्शनिक स्थापनाओं के आधार पर कविता करते थे। रानाडे जी के बाद दूसरा प्रस्थान बिन्दु मेरा नामवर जी पर बना। ग्राम्शी ने कहा था कि शोषित समाज में भी कुछ आइडियाज होते हैं, कल्पनाएं होती हैं जो एक तरह से विश्वदृष्टि होती है। अनुभव सम्मत विवेकवाद का पद इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह तात्विक है। मुझे इसके लिए कोई शब्द इस्तेमाल करना होता तो मैं इसके लिए ज्ञानमीमांसा शब्द का प्रयोग करता। यदि आपकी ज्ञान मीमांसा सत्य के निरंतरता पर आधारित है तो यह वह अवश्य अनुभव पर आधारित होती है। भक्ति परम्परा में अनुभव सम्मत विवेकवाद का विकास होता है। परंपराओं में भी केवल आपने विवेक से कोई चीज तय नहीं होता बल्कि परंपराओं के सम्मिलित संवाद से तय होता है, बनता है। भारत के अतीत को, भारत के वर्तमान को देशभाषाओं से संवाद किए बिना आप नहीं जान सकते।

विशिष्ट अतिथि नालंदा विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. सिद्धार्थ सिंह ने बताया कि मैं नामवर जी का भतीजा हूँ। वे मुझे भंते कहा करते थे। ये जो यज्ञ आशीष जी ने आयोजित किया है उसमें मैं आहुति देने के लिए खड़ा हूँ। मुझे और समीक्षा दीदी को नामवर जी शुरू में बहुत रुखे लगते थे। जिस दिन वे हमें नाम से पुकार लेते थे हमें लगता था चलो इन्हें हमारा नाम तो याद है। उन्होंने बताया कि इनकी माता जी उन्हें भगवान मानती थी। नामवर जी को यदि बी.ए.या हाई स्कूल का बच्चा मिल जाए तो वे उनकी प्रतिभा को पहचान लेते थे और घंटों बातें करते थे। महापंडित राहुल सांकृत्यायन नामवर जी को बहुत प्रिय थे। नामवर जी काशी दर्शन के पुस्तकों की तलाश में आते थे, संस्कृति के पुस्तकों के तलाश में जाते थे। हम जितने भी लोग बौद्ध साहित्य इतिहास के, धर्म के , दर्शन का जितना भी गहन अध्ययन कर लें वह दृष्टि विकसित नहीं हो पाता था जो नामवर जी अपने कुछ समय के अध्ययन में ही विकसित कर लेते थे। उन्होंने कहा था कि जाके देखना प्रतीत्यसमुत्पाद शब्द पाली साहित्य, बौद्ध साहित्य के अलावा कहीं नहीं मिलेगा। उन्होंने मुझसे कहा कभी भी पुस्तकों का पेज मोड़ा मत करो और पेन से लाइन मत बनाया करो यह पुस्तकों के साथ अन्याय है। यह छात्र छात्राओं को उनका एक संदेश था। एक उनका मंचीय धर्म था और एक व्यक्तिगत संबंधों का धर्म था। मंच पर वे बेलगाम होते थे। कभी कभी अपनी विचारधारा से विपरीत पुस्तकों का भी लोकार्पण करते थे क्योंकि वे ज्ञान का सम्मान बहुत करते थे, ये उनका ज्ञान का धर्म था। वे अपने व्यक्तिगत संबंधियों की आस्थाओं का बहुत सम्मान करते थे। वे एक दिन बीमार पड़े तो पंडित विद्यानिवास मिश्र जी आएं और पापा को भोजपुरी में खूब डांट लगाई कि आपने मुझे सूचना क्यों नहीं किया। उन्होंने मंत्रपाठ किया और उनके तकिया के नीचे रखवा दिया उन्होंने कहा इसे निकालना नहीं। नामवर जी मुस्कुराते हुए बोलें जैसी आज्ञा पण्डित जी। प्रतिक्रिया में वे दो ही शब्द प्रयोग करते थे या तो वे मूढ़ बोलते घर जा पाजी बोलते थे। नामवर जी की जिज्ञासा की कोई सीमा नहीं थी। तकनीकी से लेकर ज्ञान विज्ञान तक का ज्ञान हासिल करने की ललक थी। आज वे होते तो कृत्रिम बुद्धिमता के ज्ञान में भी निपुण होते।

मुख्य अतिथि बीएचयू की कला संकाय प्रमुखी प्रो. सुषमा घिल्डियाल कहती हैं कि नामवर जी नाम उनके माता पिता ने सोच समझकर ही रखा होगा, उनके नाम में ही ख्याति है। मुझे ज्ञात हुआ कि इस संगोष्ठी में बावन विशेषज्ञों ने नामवर जी पर अपनी बात रखी। चार सौ प्रतिभागियों में से तीन सौ लगभग बाहर के थे। कला संकाय में इस स्तर की संगोष्ठियां होती रहती हैं लेकिन इन सब में हिंदी विभाग विशिष्ट है। नामवर जी ने अपनी आलोचना में विभिन्न विषयों के ज्ञान को समेटा है।
सत्र का संचालन डॉ. प्रीति त्रिपाठी ने किया। ईश्वर जिन सुंदरताओं को रच नहीं सकता उसे कवियों के भरोसे छोड़ देता है। नामवर सिंह के यहाँ आलोचना एक संवादात्मक प्रक्रिया थी। उन्होंने हिन्दी साहित्य की आलोचना को विश्व के गलियारे में प्रतिष्ठापित किया। नामवर जी ने इतिहास के उन पन्नों को पढ़ा जिसे मुख्यधारा ने छोड़ दिया था।
कु रोशनी ,शोध छात्रा, बी एच यू ✍️।
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