जितेन्द्र कुमार दुबे की रचना :- हेडाईन......हेडाईन..।
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Published - 07 March 2026 4 views

कविता:- हेडाईन......हेडाईन..।
अक्सर ही देखा था....और.....
अनुभव भी किया था मैंने....!
बॉस की बीवी से....गाहे-ब-गाहे....
या औचक ही मिलने पर भी.....
अधीनस्थों को....भौचक होकर....
ठोकते हुए...सलाम पर सलाम...
यह सलाम भी...मिलता रहा...
बीवियों को....बिना किए...
ऑफिस का कोई भी काम-धाम.....
ऊपर से....समाज में इनका....
कुछ ऐसा होता फेमस नाम....!
कि जिसकी भी होती ये बीवियाँ,
उसी के पद के आगे ही....
प्रत्यय लग गया "आईन"....
जैसे प्रिंसिपल से प्रिंसिपलाईन,
मास्टर से मास्टराईन....और...
डॉक्टर से डॉक्टराईन,
कलक्टर से कलक्टराईन....
मैंनेजर से मैनेजराईन....और...
लेखपाल से लेखपलाईन....
इतना ही नहीं मित्रों....!
इनके आभामंडल का विस्तार इतना
कि खाओ-पियो मौज करो...
गाँव-देश-समाज में चाहे जितना....
देख-देख कर यह अजूबा....!
मन में मेरे हरदम यह विचार फूटा...
भगवान....काश ऐसा करें....!
गलती जो किए इस बार,
वह फिर दोबारा ना करें.....
अगले जनम में मुझे तो....!
बस महिला वाले सांचे में ही भरें....
और....दुनिया भर के लोग....
मुझे भी सलाम पर सलाम करें....
बिना किए कुछ काम-धाम....
सच बताऊँ मित्रों.....!
मेरी यह चिर अभिलाषा,
प्रकट हुई बनकर...एक दिन आशा
इस जनम में मेरी काया...!
नारी रूप में आई.....
संग इसी के मित्रों,
मैं "हेड" की बीवी होकर आई..
प्रफुल्ल मना अब मैं रहती,
मानी जाती मेरी हर एक बात....!
जो भी मैं.....किसी से कहती....
भरपूर सलामी भी मुझको मिलती,
रूह -बदन सब मेरी....अब तो....
अन्तर्मन से हँसती-खिलती....
गाँव-देश की सगरी जनता....!
हेड की बीवी होने के नाते,
हेडाईन-हेडाईन कहती....
उच्चारण यह मैं.....!
सही कहूँ या कहूँ गलत...
समझ में मुझको तो ना आये....
पर सच कहती हूँ....मैं प्यारे....
पदवी यह मुझको....कत्तई न सुहाए
और तो और.... मन मे एक टीस....
अक्सर ही उपजाए....
वैसे तो यह मेरी मजबूरी थी प्यारे...
स्वीकार करूँ जो दुनिया कहती है...
पर आप सभी विचार करो यह मित्रों
प्रत्यय "आईन" के सहारे....!....
मिली उपलब्धि मेरी यह....
हेडाईन.....हेडाईन.....
क्या...आपको फाईन लगती है....?
उपलब्धि मेरी यह....
हेडाईन.....हेडाईन.....
क्या...आपको फाईन लगती है....?

रचनाकर:- जितेन्द्र कुमार दुबे
अपर पुलिस उपायुक्त,लखनऊ
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