भारतीय संस्कृति के आधार: ऋषि परम्परा का चतुर्विध अवदान:- आचार्य धीरज द्विवेदी याज्ञिक।
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Published - 15 September 2026 44 views

प्रयागराज।भारत की आत्मा ऋषियों में बसती है। 'ऋषि' अर्थात् दृष्टा - "ऋषति पश्यति इति ऋषिः"। हमारी संस्कृति नगर नहीं, वन और ऋषि-कुटीर से निकली है। ऋषियों का अवदान चार क्षेत्रों में युग-प्रवर्तक रहा है।
1. ब्रह्माण्ड-बोध: ऋषियों ने ब्रह्माण्ड को जड़ नहीं, चेतन माना - "यत् पिण्डे तत् ब्रह्माण्डे"। नासदीय सूक्त का-"नासदासीन्नो सदासीत्" आज के Big Bang से भी गहरा है। उन्होंने ध्यान से वह देखा जो विज्ञान दूरबीन से देख रहा है।
2. राष्ट्र-बोध: ऋषि ने राष्ट्र को भूखंड नहीं, मातृ-चेतना माना - "माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः"। वशिष्ठ-विश्वामित्र ने राजा को धर्म सिखाया, चाणक्य ने- "पृथिव्या लाभे पालने च" से अखंड भारत का मंत्र दिया। उनका उद्घोष था - "धर्मेण धार्यते राष्ट्रम्"।

3. समाज-रचना: समाज जन्म से नहीं, कर्म से बना - चार वर्ण सहयोग का सिद्धांत थे। 16 संस्कारों से मनुष्य को संस्कारित किया और "वसुधैव कुटुम्बकम्" का विश्व-मंत्र दिया।
4. प्रकृति व धर्म-रक्षा: पीपल, तुलसी, गंगा, गौ को देव मानकर उन्होंने Ecology को धर्म बनाया। यज्ञ को "वायुमण्डलस्य शुद्धिकरणम्" कहा। धर्म को उन्होंने परिभाषित किया - "धारणाद् धर्मम्, धर्मो धारयते प्रजाः"।
आज ब्रह्माण्ड में असंतुलन, राष्ट्र में विखंडन, समाज में विद्वेष, प्रकृति में दोहन और धर्म में ह्रास है। एक ही समाधान है - ऋषि-मार्ग पर लौटना।
ऋषि मार्ग ही राष्ट्र का मार्ग है, और ऋषि दृष्टि ही सृष्टि की रक्षा का अंतिम उपाय है।
उपरोक्त बातें आचार्य धीरज द्विवेदी याज्ञिक ने श्री बज्रांग आश्रम देवली प्रतापपुर में विद्यार्थियों को ऋषि पंचमी पर विद्यार्थियों को बताया,। इस अवसर पर आचार्य साधू मिश्रा पूर्व प्रधान रामपुर, आचार्य कृष्णा दूबे,श्रीमती ज्योति द्विवेदी,श्रीमती कंचन मिश्रा प्रखण्ड उपाध्यक्षा विहिप प्रतापपुर,महंथ तुलसीदास जी, आदि लोग उपस्थित रहें।
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